Thursday, November 11, 2010

प्रीत कि इस रात में

मैं  आज ऐसे ही अचानक याद कर तुमको जगा हूँ
सोचता हूँ कौन सी फिर आज मैं  लिख दूँ कविता
कल्पना के पाखियों के पंख जब खोले खड़ा हूँ
सोचता हूँ   होती तुम  तो   लिखता कोई  प्रीती घनेरी
याद के पल जो संजो के मैंने अब  तक रख लिए हैं
उन पलों से आज रच दूँ फिर कोई रचना सुन्हेरी
पर इसी एक कशमकश में आज में उलझा  हुआ हूँ

प्रीत कि इस रात  में गर गीत कोई लिख सकूँ तो
 क्या लिखूं उस गीत में  जब शब्द ही  भाता नहीं है |
सोचता हूँ आज मैं लिख   सकूँगा एक चिटठा ,
पर शब्द हो आवारा निगोरा मस्तिष्क मैं आता नहीं है
क्या करूँ मैं चाहता हूँ जानना ये  हे शतरूपे
कि क्या वो तेरी पायलों कि ही एक खनक है
या तू है   सुरभि महकती ,
या तेरे बिखरे हुए चिकुरों कि कोई महक है ,
दिल चैन जो पता नहीं है ,
दूंढ़ कर  प्रश्नों के उत्तर आज मैं जब थक चुका  हूँ
बावरे प्रश्नों का उत्तर कोई बतलाता नहीं है |
गीत की इस पालकी में मैं श्रुति को खोजता हूँ
पर वही मिलती नहीं है प्रीत की इस रात में |

Friday, September 17, 2010

सम्बन्धों के सम्बोधन

जब बादल की परछाईं आ ढकने लगती है सूरज को


तब तब लगता लगे बदलने कुछ सम्बन्धों के सम्बोधन



क्षणिक भ्रमों को कोई सहसा सत्य मान कर चल देता है

तो यह उसका ही तो भ्रम है,सत्य नहीं होता परिवर्तित

बही हवा के झोंकों में जो बहता हुआ भटकता रहता

कर पाता है नहीं समय भी उसको निज पृष्ठों में चर्चित



परिशिष्टों के समावेश से कहाँ बदल पाती गाथायें

शिलालेख तब टूट बिखरता, जब करना चाहें संशोधन



अपनी अभिलाषाओं के होते हैं मापदंड,अपने ही

और कसौटी की क्षमता पर कुछ सन्देह उपज आते हैं

ओढ़ी हुई नकाबों में जब घुले हुए रहते हैं चेहरे

तो अपना अस्तित्व स्वयं वे अपने आप भुला आते हैं



अपनी चौपालों पर अपना गांव उन्हीं को बैठाता है

बिना किसी शंका के करते रहते जो उसका अनुमोदन



चलते हुए राह में उगते हैं जो भी छाले पांवों में

उनका अनुभव पथ में उठते हुए पगों को ही तो होता

पाता है नवनीत वही जो मथनी की रस्सी को पकड़े

जागे हुए दिवस के संग संग भरा नांद में दही बिलोता



अपने दर्पण में अपने से विलग रूप की आशा लेकर

भटकी नजरों को हो पाता है कब कहो सही उद्बोधन

Wednesday, June 2, 2010

अभी तलक भी घुली हुई हैं

तुम्हारी नजरें जहाँ गिरी थीं, कपोल पर से मेरे फिसल कर


हमारी परछाईयां उस जगह में अभी तलक भी घुली हुई हैं



हुई थी रंगत बदाम वाली हवा की भीगी टहनियों की

सजा के टेसू के रंग पांखुर पर, हँस पड़ी थी खिली चमेली

महकने निशिगंध लग गई थी, पकड़ के संध्या की चूनरी को

औ बीनती थी अधर के चुम्बन कपोल पर से नरम हथेली



जनकपुरी की वह पुष्प वीथि,जहा प्रथम दृष्टि साध होकर

मिली थी, उसकी समूची राहें अभी तलक भी खुली हुई हैं



न तीर नदिया का था न सरगम, औ न ही छाया कदम्ब वाल

न टेर गूंजी थी पी कहाँ की, न सावनों ने भिगोया आकर

मगर खुले रह गये अधर की जो कोर पर था रहा थिरकता

वही सुलगता सा मौन जाने क्या क्या सुनाता है अब भी गाकर



न जाने क्यों इस अनूठे पल में, उमड़ती घिरती हैं याद आकर

मुझे पकड़ कर अतीत में ले जायेंगी इस पर तुली हुई हैं



वो मोड़ जिस पर गुजरते अपने कदम अचानक ही आ मिले थे

वो मोड़ जिस पर सँवर गई थी शपथ के जल से भरी अंजरिया

उसी पे उगने लगीं हैं सपनों की जगमगाती हजार कोंपल

लगी उमड़ने बैसाख में आ भरी सुधा की नई बदरिया



ढुलक गई नभ में ईंडुरी से जो इक कलसिया,उसी से गिर कर

जो बूँद मुझको भिगो रही हैं वो प्रीत ही में धुली हुई हैं

Wednesday, April 21, 2010

गीत तुम संगीत हो तुम


कंठ का स्वर, शब्द होठों के मिले बस एक तुमसे
चेतना को दे रही चिति एक अभिनव प्रीत हो तुम

जो तपस्या के पलों में चित्र बनते हो वही तुम
नाम तुम जपते जिसे मालाओं के मनके निरन्तर
यज्ञ की हर आहुति को पूर्णता देती तुम ही हो
पांव प्रक्षालित तुम्हारे कर रहे सातों समन्दर

लेखनी तुम और तुम मसि,हम निमित बस नाम के हैं
सिर्फ़ इक तुम ही कवि हो और सँवरा गीत हो तुम

राग के आरोह में, अवरोह में औ’ रागिनी में
स्वर निखरते बीन की झंकार की उंगली पकड़ कर
तार पर बिखरा हुआ स्वर एक तुम हो स्वररचयिते
हर लहर उमड़ी सुरों की एक तुम ही से उपज कर

साज की आवाज़ तुम ही, तार का कम्पन तुम्हीं हो
पूर्ण जग को बाँधता लय से वही संगीत हो तुम

हो कली की सुगबुगाहट याकि गूँजा नाद पहला
शब्द को रचती हुई तुम ही बनी हर एक भाषा
बस तुम्ही अनूभूति हो,अभिव्यक्ति भी तुम ही सदाशय
भाव भी तुम,भावना तुम,प्राण की तुम एक आशा

तुम रचेता अक्षरों की,वाक तुम,स्वर तुम स्वधा तुम
प्राण दे्ती ज़िन्दगी को वह अलौकिक रीत हो तुम

Thursday, April 15, 2010

मैं तुम्हारे द्वार पर |

दृष्टि को अपनी उठा कर तुम मुझे देखो न देखो

मैं तुम्हारे द्वार पर बन दीप इक जलता रहा हूँ





नींद की चढ़ पालकी तुम चल दिये थे जब निशा में

मैं खड़ा था उस घड़ी बिसरे सपन की वीथियों में

और तुम आलेख लिखते थे नये दिनमान का जब

मैं रहा संशोधनों का चिह्न बन कर रीतियों में





एक दिन शायद नयन की कोर पर मैं टँग सकूँगा

आस की इन सीढियों पर नित्य ही चढ़ता रहा हूँ





तुम चले तो जो छिटक कर एड़ियों से उड़ गई थी

मैं उसी रज को सजा कर भाल पर अपने रखे हूँ

ओढ़नी लहरा हवा की झालरी जब बन गई थी

मैं वही मृदुस्पर्श अपनी बाँह में अब तक भरे हूँ





एक दिन उद्गम यहाँ आ जायेगा बह धार के सँग

प्राण में यह प्यास लेकर साधना करता रहा हूँ





बन गई परछायों को चूम कर जो देहरी पर

चाहता हूँ एक बूटा बन जड़ूँ उस अल्पना में

शान्त सोई झील ने जिनको सँजो कर रख लिया है

चित्र वे मैं चाहता भर पाऊँ अपनी कल्पना में





एक पारस आ कभी तो प्राण इनमें भर सकेगा

बस इसी कारण नये कुछ शिल्प मैं गढ़ता रहा हूँ

Tuesday, April 6, 2010

थीं घड़ी की सुई डगमगाती रहीं |

धूप की डोरियों से बन्धे थे प्रहर
थीं घड़ी की सुई डगमगाती रहीं
बन बिखरती रही आज की झोंपड़ी
आस तिनके पे तिनका सजाती रही

कल जो आया ढला आज में, खो गया
फिर प्रतीक्षा संवरने लगी इक नई
दांये से बांये को, बांये से दांये को
मथ रही ज़िन्दगी, इक समय की रई
जो बिखर कर गिरा भोर के साथ में
साँझ आकर उसे बीनती नित रही
बाँध बन कर पलक ने रखी रोक कर
रात जैसे घिरी एक नदिया बही

शब्द छू न सके कंठ की रागिनी
सिसकियाँ होंठ पर कसमसाती रहीं


श्ब्द थे गूंजते रह गये कान में
हो अजर हो अमर एक अहिवात के
चाँदनी की धुली हर किरन पी गये
आ अंधेरे घिरे मावसी रात के
थे हथेली लगा ओक प्यासे अधर
पिघले आकर नहीं मेघ आषाढ़ के
छांह के बरगदों की कहानी मिटी
ठूंठ बाकी रहे बस खड़े ताड़ के

ज़िन्दगी आंख में स्वप्न फिर आंज कर
कल के स्वागत में दीपक जलाती रही

जब भी उठने लगे पांव संकल्प के
एक अवरोध था सामने आ गया
दॄष्टि तत्पर हुई दस्तकें दे क्षितिज
एक कहरा उमड़ कर घना छा गया
बांह आश्वासनों की पकड़ते हुए
थक गईं उंगलियां मुट्ठियां खुल गैंई
मन के ईजिल पे टांगे हुए चित्र में
जितनी रंगीन थीं, बदलियां धुल गईं

सब निमंत्रण बहारों के गुम हो गये
पतझरी थी हवा सनसनाती रही

और फिर अधखुले होंठ से वाणियाँ
मौन हो गीत इक गुनगुनाती रहीं

Thursday, April 1, 2010

बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.

बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.


दॄष्टि तुम्हारी चूम गई थी आकर जहाँ नयन को मेरे

यह पागल मन अब भी अटका हुआ उम्र के उसी मोड़ पर



ताजमहल की परछाईं में बतियाता था मैं लहरों से

अधलेटा, सर टिका हथेली पे अपनी मैं अलसाया सा

गंध भरे बादल का टुकड़ा आया एक पास था मेरे

जैसे गीत हवा का गाया मौसम ने हो दुहराया सा



सुधियों को सम्मोहित करके साथ उड़ा ले गया कहीं पर

वह एकाग्रचित्तता की मेरी तन्द्रायें सभी तोड़ कर



संध्या की आँखों का सुरमा पिघल ढल गया था रंगों में

ढलते सूरज ने किरणों की कूची लेकर चित्र उकेरा

नीड़ लौटते पाखी ने जब छेड़ दिये थे सरगम के सुर

लेने लगा उबासी था जब पूरे दिन का थका सवेरा



जल्दी में था घर जाने की, इसीलिये ही दिन का सारथि

गया प्रतीची ले रथ अपना, चित्र तुम्हारा पास छोड़ कर



घुली हवाओं के झोंकों में ज्यों अनुभूति अजानी अद्भुत

वैसे चित्र तुम्हारा नयनों के पाटल पर बना अचानक

मिले नयन से नयन तरंगित हुई भावनाओं की डोरी

मन के पृष्ठों पर फिर सँवरे एक एक कर कई कथानक



होठों पर मेरे आ उतरी छुअन किसी नन्ही पांखुर की

या फिर रखा हवा ने कोई बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.