Tuesday, April 3, 2012

आज सोचा सब मिटा दूँ ,इस ह्रदय की वीथिओं से
पर क्या करूँ कुछ हैं विचार , कुछ 'पल' सुहाने
सप्रयत्न जो मिटते नहीं हैं ..

दुःख और सुख की एक तुला
जो दग्ध करती फिर हंसती ,
संतुलन अब खो चुकी है
वीथिओं में तम बसाती..

'पन्त' थे जो साथ चलते
लुप्त सारे हो गए हैं
मान के , सम्मान के अब द्वार सरे खो गए हैं

भाग्य का जो है विधाता
भाग्य की रेखा मिटाता
अर्ध कुछ आभास कर अब
रास्ते कटते नहीं हैं ..
कुछ हैं विचार कुछ पल सुहाने
सुप्रयात्न जो मिटते नहीं हैं ।

Saturday, January 14, 2012

आँखों के सम्मोहन से भी मन कितने लुट जाते हैं


आँखों के सम्मोहन से भी मन कितने लुट जाते हैं

बातों के ही आकर्षण में कितने बरबस आते हैं

किसने सोचा किसने जाना क्यों ऐसा हो जाता है?

पंकज की स्नेहिल बाहों में भंवरा क्यों सो जाता है ?



मन की व्यथा व्यक्त कर देना सबको अच्छा लगता है

दूजे का दुःख सुन खुश होना जग को अच्छा लगता है

ऋतू बसंत में कोयल प्यारी डाली डाली फिरती है

कौन समझ पाया दुःख उसका कैसी पीर कसकती है ?



अंधकार में दीपशिखा का जलना बात नहीं कोई

किसको खबर हुई वोह चुप चुप क्यों आंसू आंसू रोई ?

क्यों उससे मिलने को आता अंधकार में प्रेम-पतंग ?

जीवन का उत्सर्ग किस लिए वह करता,कह दे कोई?



क्यों उठता है दूर कहीं पर घायल स्वर पी -कहाँ कहाँ ?

धरती से नीले अम्बर तक क्यों फैला है दर्द यहाँ ?

गहन रात्रि में चंदा किसकी मूक कथा कहता रहता ?

कौन धरा पर फूल फूल में शबनम के मोती भरता ?

Tuesday, April 12, 2011

कभी मिले तो ये बात उसे कहना .

वो  साथ  था  तो  ज़माना  था  हमसफ़र  मेरा ...मगर  अब  कोई  नहीं  मेरे  साथ उसे  कहना ...!!!उसे  कहना  कि बिन  उसके  दिन  नहीं  कट्टा ..सिसक  -सिसक  क  कटती  है  ये  रात  उसे  कहना  ..!! उसे  पुकारो  के  खुद पोहुच  जाऊ  उसके  पास ...मगर  अब  नहीं  रहे  वो  हालात  उसे  कहना ...!!! अगर  वो  फिर  भी  न  आये  तो  एय  महेरबा ,... मेरी  जिस्ट  के  सब  हालात  उसे  कहना ...!!! हर  जीत  उसके  नाम कर  रहा  हूँ  मैं ..मैं  मानता  हूँ  अपनी  हार  उसे  कहना ...!!!बिखर  रही  है  मेरी  ज़ात उसे  कहना ...कभी  मिले तो  ये  बात  उसे  कहना ...!!!!

Thursday, November 11, 2010

प्रीत कि इस रात में

मैं  आज ऐसे ही अचानक याद कर तुमको जगा हूँ
सोचता हूँ कौन सी फिर आज मैं  लिख दूँ कविता
कल्पना के पाखियों के पंख जब खोले खड़ा हूँ
सोचता हूँ   होती तुम  तो   लिखता कोई  प्रीती घनेरी
याद के पल जो संजो के मैंने अब  तक रख लिए हैं
उन पलों से आज रच दूँ फिर कोई रचना सुन्हेरी
पर इसी एक कशमकश में आज में उलझा  हुआ हूँ

प्रीत कि इस रात  में गर गीत कोई लिख सकूँ तो
 क्या लिखूं उस गीत में  जब शब्द ही  भाता नहीं है |
सोचता हूँ आज मैं लिख   सकूँगा एक चिटठा ,
पर शब्द हो आवारा निगोरा मस्तिष्क मैं आता नहीं है
क्या करूँ मैं चाहता हूँ जानना ये  हे शतरूपे
कि क्या वो तेरी पायलों कि ही एक खनक है
या तू है   सुरभि महकती ,
या तेरे बिखरे हुए चिकुरों कि कोई महक है ,
दिल चैन जो पता नहीं है ,
दूंढ़ कर  प्रश्नों के उत्तर आज मैं जब थक चुका  हूँ
बावरे प्रश्नों का उत्तर कोई बतलाता नहीं है |
गीत की इस पालकी में मैं श्रुति को खोजता हूँ
पर वही मिलती नहीं है प्रीत की इस रात में |

Friday, September 17, 2010

सम्बन्धों के सम्बोधन

जब बादल की परछाईं आ ढकने लगती है सूरज को


तब तब लगता लगे बदलने कुछ सम्बन्धों के सम्बोधन



क्षणिक भ्रमों को कोई सहसा सत्य मान कर चल देता है

तो यह उसका ही तो भ्रम है,सत्य नहीं होता परिवर्तित

बही हवा के झोंकों में जो बहता हुआ भटकता रहता

कर पाता है नहीं समय भी उसको निज पृष्ठों में चर्चित



परिशिष्टों के समावेश से कहाँ बदल पाती गाथायें

शिलालेख तब टूट बिखरता, जब करना चाहें संशोधन



अपनी अभिलाषाओं के होते हैं मापदंड,अपने ही

और कसौटी की क्षमता पर कुछ सन्देह उपज आते हैं

ओढ़ी हुई नकाबों में जब घुले हुए रहते हैं चेहरे

तो अपना अस्तित्व स्वयं वे अपने आप भुला आते हैं



अपनी चौपालों पर अपना गांव उन्हीं को बैठाता है

बिना किसी शंका के करते रहते जो उसका अनुमोदन



चलते हुए राह में उगते हैं जो भी छाले पांवों में

उनका अनुभव पथ में उठते हुए पगों को ही तो होता

पाता है नवनीत वही जो मथनी की रस्सी को पकड़े

जागे हुए दिवस के संग संग भरा नांद में दही बिलोता



अपने दर्पण में अपने से विलग रूप की आशा लेकर

भटकी नजरों को हो पाता है कब कहो सही उद्बोधन

Wednesday, June 2, 2010

अभी तलक भी घुली हुई हैं

तुम्हारी नजरें जहाँ गिरी थीं, कपोल पर से मेरे फिसल कर


हमारी परछाईयां उस जगह में अभी तलक भी घुली हुई हैं



हुई थी रंगत बदाम वाली हवा की भीगी टहनियों की

सजा के टेसू के रंग पांखुर पर, हँस पड़ी थी खिली चमेली

महकने निशिगंध लग गई थी, पकड़ के संध्या की चूनरी को

औ बीनती थी अधर के चुम्बन कपोल पर से नरम हथेली



जनकपुरी की वह पुष्प वीथि,जहा प्रथम दृष्टि साध होकर

मिली थी, उसकी समूची राहें अभी तलक भी खुली हुई हैं



न तीर नदिया का था न सरगम, औ न ही छाया कदम्ब वाल

न टेर गूंजी थी पी कहाँ की, न सावनों ने भिगोया आकर

मगर खुले रह गये अधर की जो कोर पर था रहा थिरकता

वही सुलगता सा मौन जाने क्या क्या सुनाता है अब भी गाकर



न जाने क्यों इस अनूठे पल में, उमड़ती घिरती हैं याद आकर

मुझे पकड़ कर अतीत में ले जायेंगी इस पर तुली हुई हैं



वो मोड़ जिस पर गुजरते अपने कदम अचानक ही आ मिले थे

वो मोड़ जिस पर सँवर गई थी शपथ के जल से भरी अंजरिया

उसी पे उगने लगीं हैं सपनों की जगमगाती हजार कोंपल

लगी उमड़ने बैसाख में आ भरी सुधा की नई बदरिया



ढुलक गई नभ में ईंडुरी से जो इक कलसिया,उसी से गिर कर

जो बूँद मुझको भिगो रही हैं वो प्रीत ही में धुली हुई हैं

Wednesday, April 21, 2010

गीत तुम संगीत हो तुम


कंठ का स्वर, शब्द होठों के मिले बस एक तुमसे
चेतना को दे रही चिति एक अभिनव प्रीत हो तुम

जो तपस्या के पलों में चित्र बनते हो वही तुम
नाम तुम जपते जिसे मालाओं के मनके निरन्तर
यज्ञ की हर आहुति को पूर्णता देती तुम ही हो
पांव प्रक्षालित तुम्हारे कर रहे सातों समन्दर

लेखनी तुम और तुम मसि,हम निमित बस नाम के हैं
सिर्फ़ इक तुम ही कवि हो और सँवरा गीत हो तुम

राग के आरोह में, अवरोह में औ’ रागिनी में
स्वर निखरते बीन की झंकार की उंगली पकड़ कर
तार पर बिखरा हुआ स्वर एक तुम हो स्वररचयिते
हर लहर उमड़ी सुरों की एक तुम ही से उपज कर

साज की आवाज़ तुम ही, तार का कम्पन तुम्हीं हो
पूर्ण जग को बाँधता लय से वही संगीत हो तुम

हो कली की सुगबुगाहट याकि गूँजा नाद पहला
शब्द को रचती हुई तुम ही बनी हर एक भाषा
बस तुम्ही अनूभूति हो,अभिव्यक्ति भी तुम ही सदाशय
भाव भी तुम,भावना तुम,प्राण की तुम एक आशा

तुम रचेता अक्षरों की,वाक तुम,स्वर तुम स्वधा तुम
प्राण दे्ती ज़िन्दगी को वह अलौकिक रीत हो तुम