Thursday, November 11, 2010

प्रीत कि इस रात में

मैं  आज ऐसे ही अचानक याद कर तुमको जगा हूँ
सोचता हूँ कौन सी फिर आज मैं  लिख दूँ कविता
कल्पना के पाखियों के पंख जब खोले खड़ा हूँ
सोचता हूँ   होती तुम  तो   लिखता कोई  प्रीती घनेरी
याद के पल जो संजो के मैंने अब  तक रख लिए हैं
उन पलों से आज रच दूँ फिर कोई रचना सुन्हेरी
पर इसी एक कशमकश में आज में उलझा  हुआ हूँ

प्रीत कि इस रात  में गर गीत कोई लिख सकूँ तो
 क्या लिखूं उस गीत में  जब शब्द ही  भाता नहीं है |
सोचता हूँ आज मैं लिख   सकूँगा एक चिटठा ,
पर शब्द हो आवारा निगोरा मस्तिष्क मैं आता नहीं है
क्या करूँ मैं चाहता हूँ जानना ये  हे शतरूपे
कि क्या वो तेरी पायलों कि ही एक खनक है
या तू है   सुरभि महकती ,
या तेरे बिखरे हुए चिकुरों कि कोई महक है ,
दिल चैन जो पता नहीं है ,
दूंढ़ कर  प्रश्नों के उत्तर आज मैं जब थक चुका  हूँ
बावरे प्रश्नों का उत्तर कोई बतलाता नहीं है |
गीत की इस पालकी में मैं श्रुति को खोजता हूँ
पर वही मिलती नहीं है प्रीत की इस रात में |

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