Friday, September 17, 2010

सम्बन्धों के सम्बोधन

जब बादल की परछाईं आ ढकने लगती है सूरज को


तब तब लगता लगे बदलने कुछ सम्बन्धों के सम्बोधन



क्षणिक भ्रमों को कोई सहसा सत्य मान कर चल देता है

तो यह उसका ही तो भ्रम है,सत्य नहीं होता परिवर्तित

बही हवा के झोंकों में जो बहता हुआ भटकता रहता

कर पाता है नहीं समय भी उसको निज पृष्ठों में चर्चित



परिशिष्टों के समावेश से कहाँ बदल पाती गाथायें

शिलालेख तब टूट बिखरता, जब करना चाहें संशोधन



अपनी अभिलाषाओं के होते हैं मापदंड,अपने ही

और कसौटी की क्षमता पर कुछ सन्देह उपज आते हैं

ओढ़ी हुई नकाबों में जब घुले हुए रहते हैं चेहरे

तो अपना अस्तित्व स्वयं वे अपने आप भुला आते हैं



अपनी चौपालों पर अपना गांव उन्हीं को बैठाता है

बिना किसी शंका के करते रहते जो उसका अनुमोदन



चलते हुए राह में उगते हैं जो भी छाले पांवों में

उनका अनुभव पथ में उठते हुए पगों को ही तो होता

पाता है नवनीत वही जो मथनी की रस्सी को पकड़े

जागे हुए दिवस के संग संग भरा नांद में दही बिलोता



अपने दर्पण में अपने से विलग रूप की आशा लेकर

भटकी नजरों को हो पाता है कब कहो सही उद्बोधन

5 comments:

  1. चलते हुए राह में उगते हैं जो भी छाले पांवों में
    उनका अनुभव पथ में उठते हुए पगों को ही तो होता
    पाता है नवनीत वही जो मथनी की रस्सी को पकड़े
    जागे हुए दिवस के संग संग भरा नांद में दही बिलोता...

    सच है छालों का दर्द पांव ही जानते हैं...अच्छी रचना... बधाई

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  2. अपनी अभिलाषाओं के होते हैं मापदंड,अपने ही

    और कसौटी की क्षमता पर कुछ सन्देह उपज आते हैं

    ओढ़ी हुई नकाबों में जब घुले हुए रहते हैं चेहरे

    तो अपना अस्तित्व स्वयं वे अपने आप भुला आते हैं

    अपने मापदंडो पर सच ही संदेह उग आते हैं ...अच्छी कविता

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  3. धन्यवाद! आपके शब्द देते रहेंगे प्रेरणा यूँ ही , नित्य नए गीत लिख कर ये कलम आएगी |

    सादर,

    गौरव त्रिपाठी

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