Thursday, April 15, 2010

मैं तुम्हारे द्वार पर |

दृष्टि को अपनी उठा कर तुम मुझे देखो न देखो

मैं तुम्हारे द्वार पर बन दीप इक जलता रहा हूँ





नींद की चढ़ पालकी तुम चल दिये थे जब निशा में

मैं खड़ा था उस घड़ी बिसरे सपन की वीथियों में

और तुम आलेख लिखते थे नये दिनमान का जब

मैं रहा संशोधनों का चिह्न बन कर रीतियों में





एक दिन शायद नयन की कोर पर मैं टँग सकूँगा

आस की इन सीढियों पर नित्य ही चढ़ता रहा हूँ





तुम चले तो जो छिटक कर एड़ियों से उड़ गई थी

मैं उसी रज को सजा कर भाल पर अपने रखे हूँ

ओढ़नी लहरा हवा की झालरी जब बन गई थी

मैं वही मृदुस्पर्श अपनी बाँह में अब तक भरे हूँ





एक दिन उद्गम यहाँ आ जायेगा बह धार के सँग

प्राण में यह प्यास लेकर साधना करता रहा हूँ





बन गई परछायों को चूम कर जो देहरी पर

चाहता हूँ एक बूटा बन जड़ूँ उस अल्पना में

शान्त सोई झील ने जिनको सँजो कर रख लिया है

चित्र वे मैं चाहता भर पाऊँ अपनी कल्पना में





एक पारस आ कभी तो प्राण इनमें भर सकेगा

बस इसी कारण नये कुछ शिल्प मैं गढ़ता रहा हूँ

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