Thursday, April 1, 2010

बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.

बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.


दॄष्टि तुम्हारी चूम गई थी आकर जहाँ नयन को मेरे

यह पागल मन अब भी अटका हुआ उम्र के उसी मोड़ पर



ताजमहल की परछाईं में बतियाता था मैं लहरों से

अधलेटा, सर टिका हथेली पे अपनी मैं अलसाया सा

गंध भरे बादल का टुकड़ा आया एक पास था मेरे

जैसे गीत हवा का गाया मौसम ने हो दुहराया सा



सुधियों को सम्मोहित करके साथ उड़ा ले गया कहीं पर

वह एकाग्रचित्तता की मेरी तन्द्रायें सभी तोड़ कर



संध्या की आँखों का सुरमा पिघल ढल गया था रंगों में

ढलते सूरज ने किरणों की कूची लेकर चित्र उकेरा

नीड़ लौटते पाखी ने जब छेड़ दिये थे सरगम के सुर

लेने लगा उबासी था जब पूरे दिन का थका सवेरा



जल्दी में था घर जाने की, इसीलिये ही दिन का सारथि

गया प्रतीची ले रथ अपना, चित्र तुम्हारा पास छोड़ कर



घुली हवाओं के झोंकों में ज्यों अनुभूति अजानी अद्भुत

वैसे चित्र तुम्हारा नयनों के पाटल पर बना अचानक

मिले नयन से नयन तरंगित हुई भावनाओं की डोरी

मन के पृष्ठों पर फिर सँवरे एक एक कर कई कथानक



होठों पर मेरे आ उतरी छुअन किसी नन्ही पांखुर की

या फिर रखा हवा ने कोई बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.